उत्तराखंड के विभिन्न वन और पर्यावरण आन्दोलन (PART -1)

रंवाई आन्दोलन :- स्वतंत्रता से पूर्व टिहरी राज्य में राजा नरेन्द्रशाह के समय एक नया वन कानून लागू किया गया, जिसके तहत यह व्यवस्था थी कि किसानों की भूमि को भी वन भूमि में शमिल किया जा सकता है। इस व्यवस्था के खिलाफ रंवाई की जनता के आजाद पंचायत की घोषणा कर रियासत के खिलाफ विद्रोह शुरू कर दी। इस आन्दोलन के दौरान 30 मई 1930 को दीवान चक्रधर जुयाल के आज्ञा से सेना ने आन्दोलनकारियों पर गोली चला दी जिससे सैकड़ो किसान शहीद हो गये। आज भी इस क्षेत्र में 30 मई को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस आन्दोलन को तिलाड़ी आन्दोलन भी कहा जाता है।
चिपको आन्दोलन :- 70  के दशक में बाजों के साथ “हिम पुत्रियों की ललकार, वन नीति बदले सरकार”, वन जागे वनवासी जागे; रेणी गाँव के जंगलों में गूंजे ये नारे आज भी सुनाई दे रहे है। ध्यातव्य है कि इस आन्दोलन की शुरूआत 1972 से शुरू वनों की अंधाधुंध एवं अवैध कटाई को रोकने  के उद्देश्य से 1974 में चमोली जिले में गोपेश्वर नामक स्थान पर एक 23 वर्षीय विधवा महिला गौरी देवी द्वारा की गयी थी। इस आन्दोलन के तहत वृक्षों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणवासियों द्वारा वृक्षां को पकड़कर चिपक जाया जाता था। इसी कारण इसका नाम चिपकों आन्दोलन के तहत  वृक्षों की सुरक्षा के लिए ग्रामीणवासियों द्वारा वृक्षों को पकड़कर चिपक जाया जाता था। इसी कारण इसका नाम चिपकों आन्दोलन पड़ गया। चिपकों आन्दोलनकारी महिलाओं द्वारा 1977 में एक नारा दिया गया, जो काफी प्रसिद्ध हुआ।
  •  चिपको आन्दोलन को अपने शिखर पर पहुँचाने में पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में इस आन्दोलन का कार्यक्षेत्र समग्र रूप से पर्यावरण की रक्षा हो गया तथा बहुगुणा जी ने ‘ हिमालय बचाओं देश बचाओ’ का नारा दिया। इस आन्दोलन के चमोली के चंडी प्रसाद भट्ट को 1981 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला था।

1977 का वन आन्दोलन :- वनों की नीलामी के विरोध में अक्टूबर 1977 में राज्य स्तरीय आन्दोलन शुरू हुआ। व्यापक विरोध के बावजूद केवल नीलामी की तिथि स्थगित कर 27 नवम्बर को तय हुई। उस दिन हड़ताल, तोड़फोड़ हुई। नैनीताल का शेले हाल आन्दोलनकारियों द्वारा फूंक दिया गया। फलस्वरूप छात्रों की गिरफ्तारियां हुई। फरवरी 1978 में सम्भवतया पहली बार उत्तराखंड बन्द हुआ। द्वाराहाट के चोंचरी व पालड़ी (बागेश्वर) में जनता ने ढ़ोल-नगाड़ों के साथ वनों का कटान बन्द कराया।

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