उत्तराखंड के विभिन्न वन और पर्यावरण आन्दोलन (PART -2)


डूंगी- पैंतोली आन्दोलयन :- चमोली जनपद के डूंगी-पैंतोली में बाज का जंगल काटे जाने के विरोध में जनता द्वारा आन्दोलन किया गया। यहां बाज के जंगल को उद्यान विभाग को हस्तान्तरित कर दिया था। महिलाओं में विरोध के बाद सरकार को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।

पाणी राखो आन्दोलन :- अस्सी के दशक के मध्य में उफरैंखाल गांव ( पौड़ी गढ़वाल) के युवाओं द्वारा पानी की कमी को दूर करने के लिए चलाया गया, यह आन्दोलन काफी सफल रहा। पानी की कमी से बजंर हो गये सीढ़िदार पहाड़ी खेतों में अब पुनः हरियाली छा रही है। साथ ही पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से नंगे हो गये पहाड़ एक बार फिर घने जंगल मे बदल रहे हैं।
इस आन्दोलन के सूत्रधार उफरैंखाल के शिक्षक सच्चिदानन्द भारती ने ‘दूधातौली लोक विकास संस्थान’  का गठन कर इस क्षेत्र में जनजागरण और सरकारी अधिकारियों पर दबाव बनाकर वनों की अंधाधुंध कटाई को रूकवाया ।
अब  तक इस आन्दोलन के तहत बच्चों, नौजवानों व महिलाओ ने 15 लाख से भी अधिक पेड़ लगाए। इस आन्दोलन के तहत गठित ‘महिला मंगल दल’ अपने गाँवो के चहुँमुखी विकास हेतु कार्य कर रहे हैं।

रक्षा सूत्र आन्दोलन :- वृक्ष पर रक्षा सूत्र बाँधकर उसकी रक्षा का संकल्प लेने सम्बंधी यह आन्दोलन 1994 में टिहरी के  भिलंगना क्षेत्र से शुरू हुआ। इस आन्दोलन का मुख्य कारण ऊँचाई के वृक्षों के कटान पर लगे प्रतिबन्ध के हट जाने के बाद उo  प्रo  वन विभाग द्वारा ढ़ाई हजार वृक्षों मे चिन्ह लगाकर उनके  काटने अनुमति दिया जाना था। इसके पहले की इन्हें काटा जाता, डालगाँव, खवाड़ा, भेटी, भिगुन, तिनगढ़ आदि गाँवों की सैकड़ों महिलाओं में आन्दोलन छेड़ दिया और चिन्ह वाले वृक्षों पर रक्षा सूत्र बाँधे जाने लगे। परिणामस्वरूप तात्कालिक तौर पर वृृक्षों का कटान रूक गया। आन्दोलन के कारण आज तक रयाला के जंगल के वृक्ष चिन्ह् के बावजूद सुरक्षित है।
  •  इस आन्दोलन का नारा था- ‘ऊँचाई पर पेड़ रहेंगे/ नदी ग्लेशियर टिके रहेंगे/ पेड़ कटेंगे, पहाड़ टूटेंगे/ बिना मौत के लोग मरेंगे/ जंगल बचेगा, देश बचेगा/ गाँव-गाँव खुशहाल रहेगा।


झपटो छीनो आन्दोलन :- रैणी, लाता, तोलमा आदि गांवो की जनता ने वनों पर परम्परागत हक बहाल करने तथा नन्दादेवी राष्ट्रीय पार्क का प्रबन्ध ग्रामीण को सौंपने की मांग को  लेकर 21 जून, 1998 को लाता गांव में धरना प्रारम्भ किया और 15 जुलाई को सर्मीपवर्ता गांवों के लोग अपने पालतू जानवरों के साथ  नन्दादेवी राष्ट्रीय पार्क में घुस गए। आन्दोलन को झपटो छीनो का नाम दिया गया था।

मैती आन्दोलन :- मैती शब्द का अर्थ (गढ़वाल में) मायका होता है। इस अनूठे आन्दोलन के जनक कल्याण सिंह रावत के मन में 1996 में उपजा एक विचार, इतना विस्तार पा लेगा, इसकी उनको भी कल्पना नहीं थी। ग्वालदम इण्टर कालेज की  छात्राओं को क्षैक्षिक भ्रमण कार्यक्रम के दौरान बेदनी बुग्याल में वनों की देखभाल के लिए तल्लीनता से जुटे देखकर श्री रावत ने  महसूस किया कि पर्यावरण संरक्षण में युवतियां ज्यादा बेहतर ढ़ंग से कार्य कर सकती हैं। इसके बाद ही मैती आन्दोलन उसका संगठन और तमाम सारी बातों ने आकार  लेना शुरू किया।

  • इस आन्दोलन के तहत  आज विवाह समारोह के दौरान वर-वधू द्वारा पौधा रोपने और इसके बाद मायके पक्ष के लोगों के स्तर पर उसकी देखभाल की परम्परा विकसित हो चुकी है। विवाह के निमंत्रण पत्र पर विधिवत मैती कार्यक्रम छपता है और इसमें लोग पूरी दिलचस्पी हैं।
  • इस संगठन में यूं तो केवल अविवाहित युवतियां ही शमिल होती है लेकिन भावनात्मक तौर पर प्रत्येक ग्रामीण को इसे दिली संगठन के संचालन के लिए अध्यकक्ष चुन लेती हैं जिसे ‘दीदी’ का  दर्जा प्राप्त होता है। इसके बाद उसके निर्देंश पर हर युवती अपने-अपने घरों में बीच या पौधा रोपती हैं। बरसात के दिनों में इन पौधों को पंचायती या अन्य किसी भूमि पर सामूहिक तौर पर लगा दिया जाता है।
उत्तराखंड के विभिन्न वन और पर्यावरण आन्दोलन (PART -2) उत्तराखंड  के विभिन्न वन और पर्यावरण आन्दोलन (PART -2) Reviewed by gkall on September 02, 2018 Rating: 5

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